30 साल पुराने अधिग्रहण प्रस्ताव के नाम पर किसानों की जमीन काटी गई, मुआवजा तक नहीं मिला
ग्रामीणों के अनुसार वर्षों पूर्व नरी बांध परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण का प्रस्ताव लाया गया था, जिस पर किसानों ने आपत्ति दर्ज कराई थी। आपत्ति के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया और किसानों को न तो मुआवजा मिला और न ही अधिग्रहण की कोई अंतिम प्रक्रिया पूरी हुई। लेकिन अब लगभग 30 साल बाद वर्ष 2026 मे अचानक किसानों की जमीन सरकारी रिकॉर्ड से हटाए जाने की कार्रवाई ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्राम नरी के किसान गजाधर राम, गजनू, सीकू, हीराराम, महंगू साहू, हिरदे साहू, नारायण साहू, बलराम, धनुष व अन्य का कहना है कि उनकी जमीन आज भी उनके कब्जे में है और वे वर्षों से खेती कर रहे हैं। बावजूद इसके बिना जानकारी दिए रिकॉर्ड से नाम काट देना संविधान और राजस्व नियमों का खुला उल्लंघन है। किसानों ने आरोप लगाया कि शासन द्वारा एकपक्षीय तरीके से कार्रवाई कर उन्हें उनकी पैतृक भूमि से वंचित करने का प्रयास किया जा रहा है।
भुईया एप और राजस्व रिकॉर्ड में दिख रही गड़बड़ी
प्रभावित किसानों ने बताया कि जब उन्होंने भुईया एप और राजस्व दस्तावेजों की जांच की, तब पता चला कि कई किसानों के खसरा नंबर और रकबा रिकॉर्ड से गायब हो चुके हैं। इससे किसानों को भविष्य में जमीन संबंधी अधिकार, ऋण, फसल बीमा और अन्य सरकारी योजनाओं से भी वंचित होना पड़ सकता है।
किसानों ने की जांच और पुनः रिकॉर्ड बहाली की मांग
ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करने तथा बिना मुआवजा और विधिसम्मत प्रक्रिया के काटी गई जमीन को तत्काल रिकॉर्ड में पुनः दर्ज करने की मांग की है। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।
बड़ा सवाल — बिना मुआवजा और सूचना के कैसे काट दी गई जमीन?
अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब अधिग्रहण की प्रक्रिया वर्षों पहले अधूरी रह गई थी और किसानों को कोई मुआवजा नहीं मिला, तो आखिर किस आधार पर उनकी जमीन को सरकारी रिकॉर्ड से हटाया गया? मामला सामने आने के बाद क्षेत्र में शासन की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
