बेमेतरा। जिला अस्पताल की जीवनदीप समिति को लेकर अब सवाल केवल समिति की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि सीधे तौर पर प्रशासनिक निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिस समिति का उद्देश्य शासन और समाज के सहयोग से अस्पताल की सुविधाओं को बेहतर बनाना था, उसी समिति में पुराने दानदाताओं की कथित उपेक्षा, आजीवन सदस्यों को किनारे करने, भर्ती प्रक्रिया और दान में मिली संपत्तियों के रखरखाव को लेकर गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं।
दानदाताओं ने लाखों दिए, बदले में मिली उपेक्षा?
वर्ष 2017 में तत्कालीन कलेक्टर जितेंद्र शुक्ला के कार्यकाल में जीवनदीप समिति से जुड़े रमन अग्रवाल, रवि अग्रवाल, नंदकुमार शर्मा सहित करीब 8-10 दानदाताओं के आजीवन सदस्य होने की बात सामने आती है। आरोप है कि इन सदस्यों की आजीवन सदस्यता से संबंधित फाइल ही गायब कर दी गई और उनकी सदस्यता समाप्त कर दी गई।
यदि यह आरोप सही है तो सवाल बेहद गंभीर है—सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज आजीवन सदस्यता की फाइल आखिर गायब कैसे हुई? किसके आदेश से सदस्यता समाप्त हुई? क्या संबंधित सदस्यों को कोई सूचना दी गई? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इस पूरी प्रक्रिया का कोई लिखित रिकॉर्ड मौजूद है?
प्रशासन को इन सवालों का जवाब देना चाहिए, क्योंकि मामला किसी निजी संस्था का नहीं बल्कि जिला अस्पताल से जुड़ी सार्वजनिक समिति का है।
सवाल पूछने वाले ही क्यों हुए बाहर?
बताया जाता है कि पुराने सदस्य समिति में भर्ती प्रक्रिया, साइकिल स्टैंड, राजस्व मॉडल और जनता के हित से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाते थे। वे अस्पताल की व्यवस्था में पारदर्शिता और जनहित की बात करते थे।
अब आरोप है कि ऐसे पुराने सदस्यों को बैठकों में बुलाने से भी परहेज किया जा रहा है। तो क्या जीवनदीप समिति में अब सवाल पूछने वालों के लिए जगह नहीं है? क्या समिति में वही लोग रहेंगे जो व्यवस्था पर सवाल न उठाएं? अगर ऐसा नहीं है तो प्रशासन सार्वजनिक रूप से बताए कि पुराने आजीवन सदस्यों को बैठकों से दूर रखने का आधार क्या है?
10-15 साल पुराने कर्मचारी 8 हजार में, नए 12 हजार में!
एक तरफ वर्षों से अस्पताल में काम कर रहे कर्मचारियों के मानदेय को लेकर असंतोष है। बताया जा रहा है कि 10 से 15 वर्षों से सेवा दे रहे कुछ कर्मचारियों को करीब 8 हजार रुपये मानदेय मिल रहा है, जबकि नए कर्मचारियों को करीब 12 हजार रुपये तक भुगतान किया जा रहा है।
वर्ष 2017 में कर्मचारियों के मानदेय में वृद्धि को लेकर आवाज उठी थी और कुछ कर्मचारियों को वृद्धि का लाभ मिलने की बात सामने आती है। लेकिन आज सवाल यह है कि जिस कर्मचारी ने 10-15 साल अपनी सेवाएं दीं, उसकी सेवा अवधि का मूल्यांकन कौन करेगा? अगर नया व्यक्ति ज्यादा मानदेय का हकदार है तो पुराने कर्मचारी के लिए स्पष्ट वेतन नीति क्यों नहीं?
25 लाख की धर्मशाला बनी स्टोर रूम—प्रशासन देख रहा है या सिर्फ फाइलें?
सबसे बड़ा सवाल दानदाताओं की ओर से अस्पताल को दी गई संपत्तियों को लेकर है। स्वर्गीय श्री अनिरुद्ध प्रसाद की स्मृति में लगभग 25 लाख रुपये की लागत से करीब 2000 वर्गफुट में धर्मशाला का निर्माण कराया गया था। आज इसकी लागत और संपत्ति मूल्य कहीं अधिक हो चुका है।
लेकिन आरोप है कि जिस धर्मशाला को मरीजों और उनके परिजनों की सुविधा के लिए बनाया गया था, आज उसका उपयोग स्टोर रूम के रूप में किया जा रहा है और रखरखाव के अभाव में भवन जर्जर स्थिति में पहुंच गया है।
यानी जिस समाजसेवी ने लाखों रुपये खर्च कर अस्पताल को सुविधा दी, उसकी संपत्ति की देखरेख तक नहीं हो पा रही? क्या दान में मिली संपत्ति की कोई मेंटेनेंस पॉलिसी नहीं है? क्या जीवनदीप समिति ने कभी इन परिसंपत्तियों का भौतिक सत्यापन कराया? क्या किसी अधिकारी ने मौके पर जाकर इसकी स्थिति देखी?
छाबड़ा का शेड भी बदहाल—दान की संपत्ति का हिसाब कौन देगा?
अस्पताल के पीछे दानदाता छाबड़ा द्वारा बनाए गए शेड को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बताया जाता है कि वर्तमान में इसका उपयोग पार्किंग के लिए किया जा रहा है।
यदि दानदाताओं ने अस्पताल की सुविधा के लिए अपनी निजी राशि से निर्माण कराया था, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उस संपत्ति का वर्तमान उपयोग किस निर्णय के आधार पर हो रहा है और उसका रखरखाव कौन कर रहा है?
2017 में दानदाता थे, आज दानदाता कहां हैं?
जीवनदीप समिति का मूल आधार ही था—सरकार और समाज का सहयोग। लेकिन यदि पुराने दानदाताओं को सम्मान और सहभागिता नहीं मिलेगी, उनके द्वारा बनाई गई संपत्तियां जर्जर होंगी और आजीवन सदस्यों को ही कथित तौर पर किनारे किया जाएगा, तो भविष्य में कोई नया व्यक्ति अस्पताल के लिए दान क्यों करेगा?
आज सबसे बड़ा सवाल यही है—10 साल पहले दान देने वालों की संख्या कितनी थी और आज कितनी है? दानदाता पीछे क्यों हट रहे हैं? क्या प्रशासन ने कभी इसका कारण जानने की कोशिश की?
प्रशासन से सीधे सवाल—जवाब कौन देगा?
अब जिला प्रशासन को चाहिए कि वह केवल आरोपों को खारिज करने के बजाय दस्तावेज सार्वजनिक करे।
- आजीवन सदस्यों की मूल सूची कहां है?
- सदस्यता समाप्त करने का आदेश किसने दिया?
- संबंधित फाइल कहां गई?
- पुराने सदस्यों को बैठकों में क्यों नहीं बुलाया जा रहा?
- पुराने और नए कर्मचारियों के मानदेय में इतना अंतर क्यों?
- दान में मिली धर्मशाला का वर्तमान उपयोग क्या है?
- भवन का नियमित रखरखाव क्यों नहीं हुआ?
- दानदाता छाबड़ा द्वारा बनाए गए शेड की वर्तमान स्थिति और उपयोग क्या है?
- पिछले 10 वर्षों में जीवनदीप समिति को कितने दान मिले और उनका उपयोग कहां हुआ?
जनता को भाषण नहीं इन सवालों के दस्तावेजी जवाब चाहिए
जीवनदीप समिति किसी व्यक्ति या अधिकारी की निजी जागीर नहीं, बल्कि अस्पताल और समाज के बीच सहयोग का माध्यम है। इसलिए इसमें होने वाला हर निर्णय पारदर्शी होना चाहिए। अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो रिकॉर्ड सामने रखने में प्रशासन को परेशानी क्यों? और अगर रिकॉर्ड में सब कुछ साफ है तो दानदाताओं की संख्या लगातार घटने और पुराने सदस्यों की कथित उपेक्षा का कारण क्या है?
अब सवाल जीवनदीप समिति से ज्यादा प्रशासन की निगरानी पर है— आखिर इस पूरे मामले का जवाबदेह कौन है?