छांव देने वाले पेड़ बने ठूंठ
सड़क किनारे खड़े वे विशाल वृक्ष, जो दशकों से राहगीरों को धूप से राहत देते थे, अब ठूंठ में बदलते जा रहे हैं। जिस तेजी से पेड़ों की कटाई हो रही है, उसने “विकास बनाम पर्यावरण” की बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पेड़ों को बचाने के आधुनिक तरीके उपलब्ध होने के बावजूद विभाग ने सबसे आसान रास्ता—कटाई—को चुना।
कम दर में ठेका, गुणवत्ता पर सवाल
विभागीय जानकारी के अनुसार, इस परियोजना की निविदा राशि 8872.67 लाख रुपये है, जिसे करीब 21.79% कम दर पर स्वीकृत किया गया है। काम कवर्धा के ठेकेदार कन्हैया अग्रवाल द्वारा किया जा रहा है। जानकारों का मानना है कि इतनी कम लागत में काम होने से निर्माण गुणवत्ता और पर्यावरणीय शर्तों के पालन पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
वृक्षारोपण योजना पर सन्नाटा
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जितने पेड़ काटे जा रहे हैं, क्या उनकी भरपाई के लिए समान संख्या में पौधारोपण किया जाएगा? यदि हां, तो इसकी स्पष्ट योजना और निगरानी तंत्र क्या है? इस संबंध में अब तक कोई ठोस जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।
जिम्मेदारों की चुप्पी
पूरे प्रोजेक्ट की निगरानी पीडब्ल्यूडी के कार्यपालन अभियंता पी.एस. दीवान, अनुविभागीय अधिकारी आर.के. जायसवाल और उप अभियंताओं की टीम द्वारा की जा रही है, लेकिन पेड़ों की कटाई और पर्यावरणीय नुकसान को लेकर विभाग की ओर से कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
जनता में बढ़ती चिंता
स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि अगर इसी तरह बिना योजना के पेड़ों की कटाई होती रही, तो आने वाले समय में क्षेत्र में तापमान बढ़ेगा, जलवायु असंतुलन होगा और जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ेगा।
आपको बता दे कि सड़क चौड़ीकरण निश्चित रूप से विकास का हिस्सा है, लेकिन अगर इसके लिए हरियाली की बलि दी जा रही है, तो यह विकास नहीं, विनाश कहलाएगा। अब जरूरत है पारदर्शिता, जवाबदेही और पर्यावरण संरक्षण के ठोस कदमों की—ताकि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाया जा सके।
