जानकारी के अनुसार सहकारी समितियों के नियमों के तहत जिन किसानों ने रबी फसल का पूर्व ऋण जमा नहीं किया है, उन्हें खरीफ सीजन के लिए नया ऋण अथवा खाद-बीज उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। इसके बावजूद आरोप है कि मुरता समिति में डिफॉल्टर किसानों को भी नियमों के विपरीत नया ऋण और खाद-बीज जारी कर दिए गए।
ग्रामीणों और किसानों का कहना है कि कई किसानों के नाम पर कागजों में फर्जी KCC ऋण स्वीकृत किए गए, जबकि संबंधित किसानों को इसकी जानकारी तक नहीं थी। किसानों को तब मामले की भनक लगी जब उनके नाम पर लाखों रुपये का कर्ज दर्ज होने की जानकारी सामने आई।
मामले में सेवा सहकारी मर्यादित बैंक नवागढ़ की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इतनी बड़ी राशि के लेन-देन और कथित हेरफेर की जानकारी बैंक प्रबंधन एवं संबंधित अधिकारियों को नहीं होना संभव नहीं लगता। इससे पूरे प्रकरण में उच्च स्तर पर मिलीभगत की आशंका भी जताई जा रही है।
घटना के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं—
बैंक का ऑडिट और निगरानी तंत्र इतने बड़े वित्तीय गड़बड़ी को पकड़ने में विफल क्यों रहा?
क्या कार्रवाई केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित रहेगी या जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी?
जिन किसानों के नाम पर फर्जी ऋण दर्ज किए गए हैं, उन्हें इस आर्थिक बोझ से मुक्त करने के लिए प्रशासन क्या कदम उठाएगा?
घोटाले की खबर सामने आने के बाद प्रभावित किसान स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। किसानों एवं ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, सहकारिता विभाग और पुलिस प्रशासन से मामले की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराने तथा दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो आने वाले दिनों में यह मामला बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
