करीब 2 एकड़ ऊंचाई वाली भूमि में बारिश का पानी नहीं रुक पाने से जयलाल की खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर थी। खरीफ में मुश्किल से धान की फसल होती थी और परिवार का भरण-पोषण करना भी कठिन हो गया था। इसी बीच ग्राम रोजगार सहायक ने उन्हें मनरेगा के तहत “निजी भूमि पर डबरी निर्माण” योजना की जानकारी दी। आवेदन के बाद पंचायत के तकनीकी सहायक ने स्थल निरीक्षण कर डबरी निर्माण को मंजूरी दी।
मनरेगा के तहत डबरी निर्माण कार्य शुरू हुआ, जिसमें जयलाल और उनके परिवार ने स्वयं मजदूर बनकर काम किया। इससे उन्हें मजदूरी भी मिली और खेत में लगभग 10 फीट गहरी डबरी तैयार हो गई। बारिश में डबरी पानी से भर गई और यही पानी उनके जीवन में खुशहाली की धारा बन गया।
पानी उपलब्ध होने के बाद जयलाल ने परंपरागत खेती छोड़ “इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल” अपनाया। डबरी में रोहू, कतला और मृगल मछलियों का पालन शुरू किया गया। पहली ही खेप में करीब 12 क्विंटल मछली उत्पादन हुआ, जिससे लाखों रुपए की आय प्राप्त हुई। इसके साथ ही उन्होंने बत्तख पालन शुरू किया, जहां बत्तखों का मल मछलियों के लिए प्राकृतिक आहार बन गया और खर्च कम हो गया।
डबरी की मेड़ पर 200 देशी और कड़कनाथ मुर्गियों के लिए शेड तैयार किया गया। मुर्गियों की बीट मछलियों के भोजन और खेतों की जैविक खाद दोनों का काम करने लगी। वहीं मेड़ों पर उगाई गई सब्जियों ने अतिरिक्त आमदनी का नया रास्ता खोल दिया।
अब डबरी के पानी से जयलाल सालभर खेती कर रहे हैं। पहले जहां एक फसल मुश्किल से होती थी, वहीं अब धान, गेहूं और मौसमी सब्जियों सहित तीन फसलें ली जा रही हैं। आज उनकी वार्षिक आय बढ़कर लगभग ₹4.70 लाख से अधिक पहुंच चुकी है।
जयलाल बैसाखु कहते हैं, “पहले सालभर में 50 हजार रुपये कमाना भी मुश्किल था। मनरेगा से बनी डबरी ने मेरी जिंदगी बदल दी। अब मैं आत्मनिर्भर हूं और दूसरों को भी रोजगार दे रहा हूं। अधिकारी इसे इंटीग्रेटेड फार्मिंग कहते हैं, लेकिन मैंने तो सिर्फ मेहनत और सही योजना पर भरोसा किया।”
आज जयलाल का यह मॉडल जिले के किसानों के लिए प्रेरणा बन चुका है। मनरेगा, पशुपालन और मत्स्य पालन विभाग के अभिसरण से तैयार यह मॉडल यह साबित कर रहा है कि जल संरक्षण और संसाधनों का सही उपयोग कर सूखी जमीन को भी समृद्धि की मिसाल बनाया जा सकता है।
जयलाल का संदेश अब गांव-गांव में गूंज रहा है — “पानी रोक लो, पैसा खुद-ब-खुद आएगा।”
