मामला महज कंप्यूटर खरीदी का नहीं है। बाजार दर से कई गुना अधिक कीमत पर खरीदी, बिना मांग स्कूलों में कंप्यूटर पहुंचाने, कई स्कूलों में उनका उपयोग नहीं होने, सप्लायर की स्पष्ट जानकारी नहीं देने और कथित तौर पर फोटो खिंचवाने के बाद कंप्यूटर वापस ले जाने जैसे गंभीर तथ्य सामने आए थे। इन्हीं सवालों के बाद प्रशासन ने जांच के आदेश दिए थे।
7 दिन का आदेश, फिर जांच कहां अटकी ?
कलेक्टर के आदेश में जांच समिति को कंप्यूटरों की गुणवत्ता, उपलब्धता और संपूर्ण खरीदी प्रक्रिया की जांच कर 7 दिन में रिपोर्ट देने को कहा गया था। लेकिन निर्धारित समय बीतने के बाद भी प्रशासन ने यह स्पष्ट नहीं किया कि कितने स्कूलों का निरीक्षण किया गया, क्या-क्या तथ्य सामने आए और रिपोर्ट अब तक क्यों नहीं आई।
यहां सबसे बड़ा सवाल जांच अधिकारियों से ज्यादा प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर है। यदि जांच समिति समयसीमा में रिपोर्ट नहीं देती है तो क्या उससे जवाब मांगा गया? क्या कलेक्टर कार्यालय ने विलंब का कारण पूछा? क्या नई समयसीमा तय की गई? इन सवालों पर अब तक सार्वजनिक रूप से स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।
क्या जांच सिर्फ कागजों में रह जाएगी ?
करीब एक करोड़ रुपए की सरकारी राशि से जुड़ा मामला होने के बावजूद जांच की स्थिति पर चुप्पी कई तरह के सवाल खड़े कर रही है। शिकायतों के बाद जांच बैठाना प्रशासन की गंभीरता दिखाता है, लेकिन जांच रिपोर्ट समय पर नहीं आना उसी गंभीरता पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
यदि खरीदी पूरी तरह नियमों के मुताबिक हुई है तो जांच रिपोर्ट सामने रखने में परेशानी क्या है? और यदि जांच में अनियमितताएं सामने आई हैं तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? जनता को आखिर किस बात का इंतजार कराया जा रहा है?
प्रशासन की चुप्पी से बढ़ रहा संदेह
मामले में सबसे चिंताजनक बात यह है कि जांच का आदेश तो तेजी से जारी हुआ, लेकिन उसके बाद की कार्रवाई पर जैसे प्रशासनिक पर्दा पड़ गया हो। सात दिन में रिपोर्ट देने का आदेश देने के बाद 23 दिन तक स्थिति स्पष्ट न होना अपने आप में प्रशासन की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब प्रशासन को केवल यह कहकर नहीं बचना चाहिए कि जांच प्रक्रिया चल रही है। जनता यह जानना चाहती है कि जांच कहां तक पहुंची, रिपोर्ट किसके पास है, देरी क्यों हुई और जिम्मेदार कौन है।
सरकारी धन के इस्तेमाल से जुड़े इस मामले में यदि प्रशासन वास्तव में पारदर्शिता के पक्ष में है तो जांच रिपोर्ट और उस पर हुई कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। अन्यथा जांच के आदेश के बाद पैदा हुई यह खामोशी उन आरोपों को और हवा देगी कि कहीं मामले को ठंडे बस्ते में डालकर वास्तविक तथ्यों को दबाने की कोशिश तो नहीं हो रही।
अब सवाल सीधा है—कलेक्टर के 7 दिन के आदेश के बाद भी जांच रिपोर्ट क्यों नहीं आई? क्या जांच अधिकारियों से जवाब लिया गया? और अगर नहीं, तो आखिर प्रशासन किसका इंतजार कर रहा है?
वर्सन
जांच प्रतिवेदन अभी नहीं सौंपा गया है, टेक्निकल टीम जांच मे लगी हुई है, बहुत जल्द ही कम्प्लीट हो जायेगा !
कृष्ण कुमार साहू, डिप्टी कलेक्टर बेमेतरा
बेमेतरा टाइम्स लगातार 👇पूर्व मे लगाये गये समाचार


