कलेक्टर ने भोजन मामले में जांच के दिए निर्देश, पहले CMHO ने कथित कमीशनखोरी मामले में मांगा था प्रतिवेदन; निष्पक्ष जांच और जवाबदेही पर उठ रहे सवाल
इस घटना ने जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे पहले भी अस्पताल में मरीजों को कथित रूप से निजी अस्पताल भेजे जाने और कमीशनखोरी के आरोपों का मामला सामने आया था। उस मामले में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) ने सिविल सर्जन को नोटिस जारी कर ड्यूटी डॉक्टर की उपस्थिति, वार्ड बॉय की भूमिका और निजी एंबुलेंस के अस्पताल परिसर में प्रवेश की जांच कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।
हालांकि, उस मामले में सिविल सर्जन ने अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया कि मरीज को निजी अस्पताल ले जाने के लिए वाहन परिजनों ने स्वयं बुलाया था। लेकिन इस जवाब को लेकर कई सवाल भी उठे, क्योंकि मरीज के परिजनों का कहना था कि उनसे विस्तृत चर्चा किए बिना ही प्रतिवेदन तैयार कर दिया गया।
अब भोजन में कीड़ा मिलने के ताजा मामले में भी लोगों की निगाहें जांच पर टिकी हैं। मरीजों और परिजनों का कहना है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और सभी पक्षों के बयान लेकर की जानी चाहिए, ताकि वास्तविक तथ्य सामने आ सकें। उनका मानना है कि केवल औपचारिक प्रतिवेदन से जनता का विश्वास बहाल नहीं होगा।
गौरतलब है कि जिला अस्पताल में हाल के दिनों में डायलिसिस सेंटर की छत से पानी टपकने का मामला भी सामने आया था। अब प्रसूताओं को दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता पर सवाल उठने से अस्पताल की व्यवस्थाओं पर लगातार प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस बार जांच केवल फाइलों तक सीमित रहेगी, या फिर वास्तविक जिम्मेदारों की जवाबदेही भी तय होगी? कलेक्टर के निर्देश के बाद अब जिला प्रशासन के पास यह अवसर है कि वह निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट करे कि भोजन में कीड़ा कैसे पहुंचा, निगरानी व्यवस्था में चूक कहां हुई और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।
जनता की अपेक्षा यही है कि जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर हो, सभी संबंधित पक्षों के बयान दर्ज किए जाएं और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष एवं प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
