दो शव मिले, कई गौवंश बीमार ; कंकालों की संख्या अब भी जांच के घेरे में—क्या समय रहते जागता प्रशासन तो बच सकती थीं बेजुबानों की जान?
मामला सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि इतनी बड़ी संख्या में गौवंश लंबे समय से एक ही स्थान पर रखे गए थे, तो उनकी देखरेख, चारा-पानी और स्वास्थ्य व्यवस्था की नियमित निगरानी आखिर कौन कर रहा था? क्या जिम्मेदार विभागों की ओर से समय-समय पर निरीक्षण किया गया था या फिर बेजुबान पशुओं की हालत बिगड़ने का इंतजार किया जाता रहा?
मौतों के दावे ने खड़े किए कई सवाल
गौसेवकों के अनुसार बड़ी संख्या में गौवंशों को निजी बाड़े में रखा गया था। आरोप है कि वहां पर्याप्त चारा, भूसा, पानी, सफाई और पर्याप्त जगह की व्यवस्था नहीं थी। अधिक संख्या में मवेशियों के कारण कई पशुओं के कीचड़ में फंसने, घायल होने और बीमार पड़ने की बात भी सामने आई है।
यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो सवाल केवल बाड़ा संचालक पर ही नहीं, बल्कि संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था पर भी उठना स्वाभाविक है। आखिर इतने बड़े पैमाने पर गौवंश रखे जाने की जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों को थी या नहीं?
दो शव मिले, कई बीमार; कंकालों ने बढ़ाई चिंता
उपसंचालक पशु चिकित्सा सेवाएं डॉ. राजेंद्र भगत के अनुसार सूचना मिलने पर विभागीय टीम मौके पर पहुंची। जांच के दौरान दो गायों के शव मिले, जबकि कई गौवंश बीमार पाए गए। मौके पर कुछ कंकाल भी मिले हैं, लेकिन उनकी संख्या और वास्तविक स्थिति की पुष्टि अभी बाकी है।
ऐसे में गौसेवकों द्वारा बताए जा रहे करीब 50 गौवंशों की मौत के दावे की स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक जांच बेहद जरूरी हो गई है। पोस्टमार्टम, शवों की पहचान, कंकालों की जांच और मौके के दस्तावेजी साक्ष्यों से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
1200 रुपये प्रति मवेशी लेने के आरोप, फिर व्यवस्था कहां गई?
गौसेवक हरीश कुमार चौहान की लिखित शिकायत में आरोप लगाया गया है कि निजी बाड़े में प्रति मवेशी करीब 1200 रुपये लेकर बड़ी संख्या में गौवंश रखे जाते थे। शिकायत में पर्याप्त चारा-पानी, सफाई और जगह की व्यवस्था नहीं होने का आरोप भी लगाया गया है।
यदि प्रति पशु राशि लेने का आरोप सही है तो यह जांच का महत्वपूर्ण बिंदु है कि उस राशि का उपयोग किस मद में और किस प्रकार किया गया। प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि गौवंशों को वहां रखने की अनुमति किस आधार पर थी और उनकी देखरेख की जिम्मेदारी किसकी थी।
मृत गौवंशों के निस्तारण पर भी गंभीर आरोप
शिकायत में मृत मवेशियों के शवों को उचित तरीके से निस्तारित करने के बजाय ट्रैक्टर से खींचकर खुले मैदान या नदी में फेंकने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पुलिस इन आरोपों की जांच कर रही है।
यदि यह आरोप सत्य साबित होते हैं तो मामला केवल पशु क्रूरता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं की भी जांच जरूरी होगी।
पुलिस ने दर्ज किया अपराध
मामले की गंभीरता को देखते हुए दाढ़ी थाना पुलिस ने आरोपी दिलीप राय, पिता धर्मदास राय के खिलाफ बीएनएस की धारा 325 तथा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 11(1)(क) एवं 11(1)(ज) के तहत अपराध दर्ज किया है। पुलिस द्वारा मामले से जुड़े आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच की जा रही है।
गौसेवकों ने तत्काल व्यवस्था की मांग की
गौसेवक आदेश सोनी, हरीश चौहान, ओमेश बिसेन, मनीष शुक्ला और रोमन पाण्डेय सहित स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से मौके का वास्तविक सत्यापन कराने की मांग की है। उन्होंने जीवित गौवंशों के लिए तत्काल पर्याप्त चारा, भूसा और पानी उपलब्ध कराने तथा पशु चिकित्सकों की टीम भेजकर उपचार कराने की मांग की है।
साथ ही मृत गौवंशों के अवशेषों का नियमानुसार निस्तारण और कथित लापरवाही की निष्पक्ष जांच की मांग भी उठाई गई है।
गौ सेवा आयोग ने लिया संज्ञान
मामले की सूचना के बाद गौ सेवा आयोग के उपाध्यक्ष राजीव लोचन महाराज ने भी संज्ञान लेते हुए निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
अब सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदारी तय होगी या मामला जांच में ही दब जाएगा?
हेमाबंद की घटना ने गौवंश संरक्षण के दावों के साथ-साथ प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। यदि मौके पर बड़ी संख्या में बीमार पशु और कंकाल मिले हैं, तो यह पता लगाना जरूरी है कि उनकी हालत यहां तक कैसे पहुंची।
प्रशासन को अब सिर्फ अपराध दर्ज करने तक सीमित रहने के बजाय यह भी सार्वजनिक करना होगा कि बाड़े का निरीक्षण कब-कब हुआ, गौवंशों की संख्या कितनी थी, उनके चारा-पानी की क्या व्यवस्था थी और कथित मौतों की वास्तविक वजह क्या निकली।
बेजुबानों की मौत पर जांच की खानापूर्ति नहीं, जिम्मेदारी तय करने वाली कार्रवाई की जरूरत है।


