गांव के सरकारी स्कूल से हिंदी माध्यम में पढ़ाई, घर पर ऑनलाइन तैयारी और लगातार मेहनत से डॉक्टर बनने की राह पर बढ़ा किसान का बेटा
किसान मनोज साहू के बेटे मुकेश ने कक्षा पहली से 12वीं तक की पढ़ाई गांव के ही शासकीय स्कूल से हिंदी माध्यम में पूरी की। सामान्य ग्रामीण परिवेश से आने वाले मुकेश ने 12वीं के बाद मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए किसी बड़े शहर या महंगी कोचिंग का रुख नहीं किया। उन्होंने घर पर रहकर ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई की और अपनी मेहनत को ही सबसे बड़ा हथियार बनाया।
2024 में कुछ अंकों से चूके, 2025 में एक सवाल ने रोका रास्ता
मुकेश की सफलता के पीछे संघर्ष की लंबी कहानी है। वर्ष 2024 में उन्होंने NEET की परीक्षा दी, लेकिन कुछ अंकों की कमी के कारण उनका चयन नहीं हो पाया। पहली असफलता के बाद भी उन्होंने खुद को संभाला और अगले प्रयास के लिए और अधिक मेहनत शुरू कर दी।
वर्ष 2025 में उन्हें लगा कि इस बार मंजिल करीब है, लेकिन किस्मत ने फिर परीक्षा ली। महज एक प्रश्न के कारण वे चयन से चूक गए। लगातार दो बार सफलता हाथ से निकलने के बाद भी मुकेश ने अपने सपने को छोड़ने के बजाय खुद से एक और मौका मांगा।
तीसरी कोशिश में मेहनत लाई रंग
दो असफलताओं के बाद भी मुकेश ने अपनी तैयारी जारी रखी। उन्होंने अपनी कमियों को पहचाना, गलतियों से सीखा और तीसरे प्रयास में पहले से ज्यादा आत्मविश्वास के साथ परीक्षा दी। आखिरकार NEET 2026 के परिणाम ने उनकी मेहनत पर सफलता की मुहर लगा दी।
राज्य की प्रथम चरण की काउंसलिंग में उनका चयन शासकीय चंदूलाल चंद्राकर मेडिकल कॉलेज, दुर्ग में MBBS के लिए हुआ है। जिस सपने के लिए उन्होंने वर्षों तक मेहनत की, वह अब हकीकत बनने जा रहा है।
मामा का साथ बना हौसले की ताकत
मुकेश अपनी सफलता का श्रेय अपने परिवार, गुरुजनों, इष्टदेव और विशेष रूप से अपने मामा को देते हैं। उन्होंने बताया कि दो बार चयन से चूकने के बाद जब निराशा हो सकती थी, तब उनके मामा ने उनका साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने लगातार उनका हौसला बढ़ाया और उन्हें फिर से प्रयास करने के लिए प्रेरित किया।
मुकेश के लिए यह सफलता सिर्फ एक परीक्षा पास करने की उपलब्धि नहीं है, बल्कि उन सभी विद्यार्थियों के लिए संदेश है जो पहली या दूसरी असफलता के बाद अपने सपनों को छोड़ने का विचार करने लगते हैं।
मुकेश की कहानी कहती है—साधन नहीं, संकल्प बड़ा होना चाहिए
गांव के सरकारी स्कूल में हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने वाला एक किसान का बेटा, घर पर रहकर ऑनलाइन तैयारी करता है और तीसरे प्रयास में मेडिकल कॉलेज तक पहुंचता है—मुकेश की कहानी इस बात का उदाहरण है कि सफलता के लिए हमेशा बड़े शहर, महंगी कोचिंग या बड़े संसाधन ही जरूरी नहीं होते।
जरूरत होती है लगातार मेहनत करने की, अपनी गलतियों से सीखने की और असफलता के बाद फिर खड़े होने की। मुकेश ने दो बार मिली निराशा को अपने हौसले पर हावी नहीं होने दिया। तीसरी कोशिश में उन्होंने न सिर्फ NEET में सफलता हासिल की, बल्कि अपने परिवार और पूरे गांव का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।
आज मुरता गांव में मुकेश की सफलता की चर्चा है। उनके सफर ने गांव के उन विद्यार्थियों के मन में भी उम्मीद जगाई है, जो सीमित संसाधनों के बीच बड़े सपने देखते हैं। मुकेश ने साबित कर दिया कि मंजिल तक पहुंचने के लिए रास्ते कितनी बार रोकें, यह मायने नहीं रखता; मायने यह रखता है कि हम मंजिल तक पहुंचने के लिए कितनी बार फिर से कोशिश करते हैं।
