दवा विक्रेताओं का कहना है कि इंटरनेट और मोबाइल ऐप्स के जरिए बिना पर्याप्त निगरानी के दवाओं की बिक्री हो रही है, जिससे न केवल छोटे व्यापारियों का कारोबार चौपट हो रहा है बल्कि मरीजों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ गई है।
बिना पर्ची बिक रहीं दवाएं, बढ़ रहा खतरा
केमिस्टों ने आरोप लगाया है कि कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बिना डॉक्टर की वैध पर्ची के दवाइयों की बिक्री धड़ल्ले से हो रही है। एक ही प्रिस्क्रिप्शन को बार-बार अपलोड कर दवाएं मंगाई जा रही हैं। फर्जी पर्चों के जरिए नशीली दवाएं और भारी एंटीबायोटिक्स भी आसानी से लोगों तक पहुंच रही हैं। दवा विक्रेताओं के अनुसार, नाबालिगों और नशे के आदी लोगों द्वारा इस व्यवस्था का सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया जा रहा है, जो समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
भारी डिस्काउंट से छोटे दुकानदारों पर संकट
दवा व्यापारियों का कहना है कि बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर भारी छूट देकर बाजार के नियमों को बिगाड़ रही हैं। मोहल्लों, गांवों और छोटे शहरों में वर्षों से संचालित मेडिकल स्टोर इस प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पा रहे हैं। लगातार घाटे के कारण कई छोटे दुकानदारों की दुकानें बंद होने की कगार पर पहुंच गई हैं।
कोरोना काल के नियमों के दुरुपयोग का आरोप
दवा विक्रेताओं ने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान सरकार द्वारा दवा बिक्री संबंधी कुछ नियमों में अस्थायी ढील दी गई थी, लेकिन महामारी समाप्त होने के बाद भी वे नियम प्रभावी बने हुए हैं। उनका आरोप है कि ई-फार्मेसी कंपनियां इन्हीं नियमों का गलत फायदा उठाकर अवैध तरीके से कारोबार कर रही हैं।
संगठन की प्रमुख मांगें
दवा विक्रेताओं ने केंद्र सरकार से मांग की है कि—
कोरोना काल में जारी अस्थायी नियम G.S.R. 220(E) को तत्काल रद्द किया जाए।
ऑनलाइन फार्मेसी को राहत देने वाली अधिसूचना G.S.R. 817(E) वापस ली जाए।
बड़ी कंपनियों द्वारा दिए जा रहे भारी डिस्काउंट पर सख्त रोक लगाई जाए।
“यह सिर्फ व्यापार नहीं, मरीजों की सुरक्षा का सवाल”
AIOCD के अध्यक्ष जेएस सिंदे, महासचिव राजीव सिंघल तथा बेमेतरा जिला दवा विक्रेता संघ के अध्यक्ष दिनेश दुबे और सचिव नवीन अग्रवाल ने कहा कि यह आंदोलन केवल व्यापार बचाने के लिए नहीं बल्कि मरीजों की सुरक्षा और दवा व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए किया जा रहा है।
संगठन का दावा है कि ई-फार्मेसी और भारी छूट की नीति के कारण दवा व्यापार से जुड़े करीब 5 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ गई है। दवा विक्रेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि 20 मई तक सरकार ने उनकी मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा, जिससे देश की स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
