हालात बिगड़े तो 30 किमी दूर जिला अस्पताल बेमेतरा क्यों नहीं? बिलासपुर रेफर करने के फैसले पर उठे सवाल—दवाओं के बैच और उपचार प्रोटोकॉल की भी हो जांच
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अमृतलाल रोहलेडकर के अनुसार मनीष पाटिल को उपचार के दौरान एंटी स्नेक वेनम के 20 डोज (वायल) लगाए गए, लेकिन उनकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। इसके बाद उन्हें 108 एंबुलेंस के माध्यम से बिलासपुर रेफर किया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई।
हालात बिगड़े तो बेमेतरा क्यों नहीं?
सीएमएचओ के इस बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब मरीज की स्थिति गंभीर हो रही थी, तब उसे लगभग 30 किलोमीटर दूर जिला चिकित्सालय बेमेतरा ले जाने के बजाय बिलासपुर रेफर करने का निर्णय क्यों लिया गया?
क्या नवागढ़ में उपलब्ध उपचार सुविधाओं के बाद बेमेतरा जिला अस्पताल में आवश्यक उपचार उपलब्ध नहीं था? यदि उपलब्ध था, तो मरीज को वहां क्यों नहीं लाया गया? और यदि जिला अस्पताल में भी सर्पदंश के गंभीर मरीज के लिए पर्याप्त सुविधा नहीं थी, तो स्वास्थ्य विभाग ने इसकी पूर्व तैयारी क्यों नहीं की? इन सवालों का स्पष्ट जवाब स्वास्थ्य विभाग को देना चाहिए।
20 डोज लगे, फिर भी हालत क्यों नहीं सुधरी?
मामले में यह भी जांच का विषय है कि मनीष पाटिल को लगाए गए एंटी स्नेक वेनम की किस कंपनी/निर्माता की दवा थी, उसका बैच नंबर क्या था, उसकी एक्सपायरी डेट क्या थी, उसे किस अस्पताल से प्राप्त किया गया और उसका स्टोरेज निर्धारित मानकों के अनुसार हुआ था या नहीं।
हालांकि 20 डोज लगने के बाद भी मरीज की हालत नहीं सुधरी, इसका मतलब अपने आप यह साबित नहीं करता कि दवा नकली या बेअसर थी। सर्पदंश की गंभीरता, सांप का विष, मरीज की स्थिति और उपचार शुरू होने में लगा समय जैसे कई कारक परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन मनीष की मौत के बाद इस्तेमाल किए गए एंटी स्नेक वेनम के बैच और स्टोरेज की जांच कराना पूरी तरह उचित और जरूरी सवाल बन जाता है।
दवा की गुणवत्ता से लेकर उपचार प्रोटोकॉल तक हो जांच
स्वास्थ्य विभाग को केवल यह बताकर जिम्मेदारी पूरी नहीं करनी चाहिए कि मरीज को 20 डोज एंटी स्नेक वेनम लगाए गए। यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि—
- मरीज को सर्पदंश के कितनी देर बाद अस्पताल लाया गया?
- एंटी स्नेक वेनम कितने समय में शुरू किया गया?
- 20 डोज किस अवधि में दिए गए?
- मरीज की हालत बिगड़ने पर कौन-कौन से उपचार किए गए?
- बेमेतरा जिला अस्पताल में रेफर करने के बजाय बिलासपुर भेजने का चिकित्सकीय आधार क्या था?
- इस्तेमाल किए गए ASV का बैच नंबर, निर्माण एवं एक्सपायरी विवरण क्या था?
- दवा का स्टोरेज निर्धारित तापमान और मानकों के अनुसार हुआ था या नहीं?
- क्या इस्तेमाल किए गए बैच के नमूने की गुणवत्ता जांच कराई जाएगी?
बरसात में सर्पदंश का खतरा, फिर भी तैयारी पर सवाल
बरसात के मौसम में सांप निकलने और सर्पदंश की घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में जिले के स्वास्थ्य केंद्रों में ASV, ऑक्सीजन, आवश्यक आपातकालीन दवाएं, प्रशिक्षित स्टाफ और समयबद्ध रेफरल व्यवस्था सुनिश्चित करना स्वास्थ्य विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
मनीष पाटिल की मौत ने इस पूरी व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्नेक रेस्क्यूर होकर दूसरों की जान बचाने वाले व्यक्ति की जान आखिर क्यों नहीं बचाई जा सकी? यह सवाल अब सिर्फ उनके परिवार और जीव प्रेमियों का नहीं, बल्कि पूरे जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था का है।
जांच सिर्फ कागजों में नहीं, पूरी व्यवस्था की हो
बेमेतरा जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कर वास्तविक कारण सार्वजनिक करना चाहिए। जांच में उपचार की टाइमलाइन, रेफरल का निर्णय, एंटी स्नेक वेनम की गुणवत्ता एवं स्टोरेज, चिकित्सकीय प्रोटोकॉल और आपातकालीन व्यवस्था—सभी पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए।
अगर कहीं चिकित्सकीय लापरवाही, रेफरल में अनुचित देरी, व्यवस्था की कमी या दवा की गुणवत्ता संबंधी गड़बड़ी सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई होनी चाहिए।
मनीष पाटिल की मौत को महज एक हादसा मानकर फाइल बंद करना पर्याप्त नहीं होगा—अब सवाल है कि बेमेतरा की स्वास्थ्य व्यवस्था अगली जिंदगी बचाने के लिए कितनी तैयार है?
