बेरला में कई परियोजनाओं का विरोध, ग्रामीणों ने जताई खेती, पानी, स्वास्थ्य और पर्यावरण प्रभावित होने की आशंका
समिति से जुड़े लोगों के अनुसार सरदा गांव में स्पंज आयरन इकाई शुरू हो चुकी है। मुड़पार में जी.आर. इस्पात तथा बोरिया क्षेत्र में नीरगंगा-वंदना इस्पात की परियोजनाएं भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं। वहीं कंडरका में वरदा स्पंज आयरन और रांका में एस. बद्रीनाथ स्पंज आयरन को लेकर भी ग्रामीणों की चिंता सामने आ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि कुछ परियोजनाओं में जनसुनवाई अथवा अन्य प्रक्रियाओं को लेकर भी सवाल हैं, जिनकी प्रशासनिक स्तर पर स्पष्टता आवश्यक है।
जनसुनवाई के बाद भी ग्रामीणों का विरोध
नेवनारा में लगभग 270 एकड़ भूमि पर सारद्रा एनर्जी की स्पंज आयरन परियोजना के लिए वर्षों पहले जनसुनवाई हुई थी। ग्रामीणों का दावा है कि उस समय आसपास के गांवों के लोगों ने एकजुट होकर परियोजना का जोरदार विरोध किया था और आज तक परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
इसी क्षेत्र में लगभग 45 एकड़ भूमि पर अरहम इस्पात की परियोजना के लिए करीब आठ माह पूर्व हुई जनसुनवाई में भी ग्रामीणों ने विरोध दर्ज कराया। इसी तरह कोहड़िया में ब्रजेश स्टील की परियोजना को लेकर करीब 11 माह पूर्व हुई जनसुनवाई में भी ग्रामीणों द्वारा विरोध किए जाने की बात सामने आई है।
नवागढ़ ब्लॉक के झिरिया में नाविक स्पंज आयरन को लेकर हुई जनसुनवाई में भी ग्रामीणों द्वारा विरोध किए जाने का दावा किया गया है। नवागढ़ के मुड़पार में भी प्रस्तावित परियोजना को लेकर ग्रामीणों के बीच चिंता बनी हुई है।
आज स्पंज आयरन, कल गांव छोड़ने की नौबत न आ जाए
पर्यावरण बचाओ समिति से जुड़े ग्रामीणों का कहना है कि उनका विरोध विकास के खिलाफ नहीं, बल्कि कृषि भूमि, जलस्रोत, पर्यावरण और ग्रामीणों के स्वास्थ्य की सुरक्षा को लेकर है। ग्रामीणों का आरोप है कि औद्योगिक इकाइयों के आसपास खेती प्रभावित होने, जमीन में पानी भरने और खेतों में काम करने के दौरान त्वचा संबंधी परेशानी जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं।
ग्रामीणों ने औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले धुएं और प्रदूषण को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि प्रदूषण नियंत्रण के निर्धारित मानकों का कड़ाई से पालन नहीं हुआ तो आने वाले समय में इसका असर कृषि और जनस्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
इथेनॉल प्लांटों से बदबू की शिकायत
जिले में प्रस्तावित/स्थापित इथेनॉल परियोजनाओं को लेकर भी ग्रामीणों की चिंता सामने आई है। समिति के अनुसार जिले में करीब 11 इथेनॉल फैक्ट्रियों की परियोजनाएं बताई जा रही हैं। भैसा गांव में इकाई शुरू होने के बाद पथर्रा में भी परियोजना आगे बढ़ी है, जबकि भीलौरी और रांका में परियोजनाओं के जल्द शुरू होने की बात कही जा रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जहां इथेनॉल प्लांट संचालित हो रहे हैं, वहां तेज दुर्गंध की समस्या से लोगों को परेशानी हो रही है। विशेषकर भोजन के समय बदबू से परेशानी होने की शिकायतें ग्रामीणों द्वारा की जा रही हैं।
लोहिया पेपर मिल हादसे का भी दिया हवाला
ग्रामीणों ने नेवनारा स्थित लोहिया पेपर मिल में जर्जर दीवार गिरने से कर्मचारी की मौत जैसी घटना का हवाला देते हुए औद्योगिक क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी पर भी सवाल उठाए हैं। साथ ही उद्योगों के आसपास जलभराव, खेती में परेशानी तथा किसानों द्वारा स्वास्थ्य संबंधी शिकायतें किए जाने की बात कही गई है।
सिलतरा-सोंडरा का उदाहरण देकर ग्रामीणों को चेताया
पर्यावरण बचाओ समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि रायपुर क्षेत्र के सिलतरा, सोंडरा और साकरा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों का उदाहरण सामने है, जहां औद्योगिक विस्तार के कारण आसपास के गांवों में जमीन और पर्यावरण को लेकर लंबे समय से चिंताएं उठती रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते बेमेतरा में पर्यावरणीय प्रभाव, जल और कृषि भूमि की स्थिति पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो भविष्य में यहां भी ग्रामीणों के सामने अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।
ग्रामीणों ने शासन और जिला प्रशासन से मांग की है कि प्रत्येक औद्योगिक परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति, जनसुनवाई, प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था, जल उपयोग, कृषि भूमि पर प्रभाव तथा ग्रामीण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की निष्पक्ष समीक्षा की जाए।
ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो आने वाली पीढ़ियों की जमीन, पानी, हवा और स्वास्थ्य की कीमत पर हो।
