सूत्रों के मुताबिक मामला खासतौर पर शौचालय संबंधी जानकारी को लेकर गरमा गया है। कई शिक्षकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सर्वे के दौरान ग्रामीणों ने साफ कहा कि उनके घरों में अब भी शौचालय नहीं है। शिक्षकों का दावा है कि उन्होंने वही जानकारी फॉर्म में दर्ज की, जो मौके पर मिली। लेकिन जैसे ही यह डेटा उच्च अधिकारियों तक पहुंचा, कथित तौर पर उसे बदलने की बात कही जाने लगी। शिक्षकों का आरोप है कि अधिकारियों द्वारा कहे जा रहे हैं कि जिन घरों में शौचालय नहीं है, वहां भी “हाँ” या “साझा शौचालय” दर्ज किया जाए।
बताया जा रहा है कि इसकी बड़ी वजह जिले का पहले से ODF (Open Defecation Free) घोषित होना है। यदि बड़ी संख्या में घरों में शौचालय न होने की जानकारी आधिकारिक रिकॉर्ड में जाती है, तो सरकारी दावों और उपलब्धियों पर सवाल उठ सकते हैं।
इस पूरे मामले ने सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि आखिर सही कौन है — वे शिक्षक जो गांव-गांव जाकर जमीनी हकीकत दर्ज कर रहे हैं, या वह सिस्टम जो पहले से घोषित उपलब्धियों को बचाने में जुटा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि जनगणना और सर्वे जैसे संवेदनशील कार्यों में यदि आंकड़ों को “फिट” करने की कोशिश होती है, तो इसका असर सिर्फ रिपोर्ट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भविष्य की योजनाओं, बजट और सरकारी नीतियों की नींव भी कमजोर हो सकती है।
वर्सन
हाँ या ना मे बदलने दबाव बनाने वाली ऐसी कोई बात नहीं है ! मानव मल हाथ से उठाया जाता जाता है ऐसा इंग्लिश में ऑप्शन है, कई शिक्षक समझ नहीं पाए और हां दर्ज कर दिए है जिसे सुधारने के लिए कहा जा रहा है !
अनिरुद्ध मिश्रा तहसीलदार बेमेतरा
