मुरता समिति में 111 किसानों के नाम पर ऋण वसूली, फर्जी रसीद, समायोजन और लाखों रुपये के कथित गबन का मामला सामने आने के बाद अब संबंधित ऑडिट रिपोर्टों और उस अवधि में अंकेक्षण करने वाले अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है
सूत्रों और स्थानीय स्तर पर उठ रही मांगों के अनुसार सहकारिता विभाग के उस ऑडिटर के कार्यकाल की भी निष्पक्ष जांच कराए जाने की मांग उठ रही है। जिस ऑडिटर में मुरता समिति का उन वित्तीय वर्षों में ऑडिट किया था, लोगों का तर्क है कि यदि नियमित ऑडिट के बावजूद इतनी बड़ी वित्तीय अनियमितता सामने आई है तो यह जांच का विषय है कि ऑडिट के दौरान इन बिंदुओं का परीक्षण क्यों नहीं हुआ। मुरता घोटाले के बाद स्थानीय स्तर पर यह मांग उठ रही है कि सहकारी समितियों के ऑडिट और निगरानी व्यवस्था की भी उच्चस्तरीय समीक्षा की जाए।
कई अन्य मामलों को लेकर भी उठ रहे सवाल
सहकारी क्षेत्र से जुड़े कुछ लोगों द्वारा विभिन्न समितियों में पदस्थापना, बहाली, प्रभार वितरण और प्रशासनिक निर्णयों में कथित लेनदेन के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन मुरता घोटाले के बाद इन सभी बिंदुओं की जांच की मांग तेज हो गई है।
किसानों की मांग - केवल कर्मचारियों नहीं, पूरे सिस्टम की जांच हो !
किसानों और ग्रामीणों का कहना है कि यदि 57 लाख रुपये से अधिक की राशि का कथित गबन हुआ है तो केवल समिति स्तर के कर्मचारियों की जांच पर्याप्त नहीं होगी। ऑडिट, बैंकिंग निगरानी, विभागीय नियंत्रण और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मुरता घोटाले की जांच केवल एफआईआर तक सीमित रहती है या फिर सहकारी विभाग की पूरी निगरानी व्यवस्था की परतें भी खुलती हैं। क्षेत्र में लोगों की नजर अब प्रशासन, पुलिस और सहकारिता विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई है।
आगे भी इस मामले से जुड़े खबर लगातार हम लगाते रहेंगे तब तक के लिए आप पढ़ते रहिए बेमेतरा टाइम्स
