संपादक के कलम से : सुशासन तिहार के बाद भी जनदर्शन में भीड़, क्या समाधान शिविरों पर लोगो को भरोसा नहीं ?


बेमेतरा ! प्रदेश सरकार इन दिनों पूरे राज्य में "सुशासन तिहार" मना रही है। गांव-गांव और शहर-शहर में समाधान शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। इन शिविरों का उद्देश्य यही बताया जा रहा है कि जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान हो, लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें और प्रशासन स्वयं उनके द्वार तक पहुंचे। लेकिन एक बड़ा सवाल तब खड़ा होता है जब इन तमाम प्रयासों के बावजूद प्रत्येक सोमवार को जिला कलेक्ट्रेट में आयोजित होने वाले जनदर्शन में शिकायतकर्ताओं की संख्या कम होने के बजाय लगातार बनी हुई है।

यदि समाधान शिविर वास्तव में प्रभावी साबित हो रहे हैं, तो फिर लोग अपनी समस्याएं लेकर जनदर्शन में क्यों पहुंच रहे हैं? आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि नागरिकों को फिर से जिला मुख्यालय का रुख करना पड़ रहा है?

संभव है कि कई मामलों में समाधान शिविरों में आवेदन तो लिए जा रहे हों, लेकिन समस्याओं का निराकरण अपेक्षित गति से नहीं हो रहा हो। ग्रामीण और आम नागरिक तब तक संतुष्ट नहीं होता जब तक उसे अपनी समस्या का वास्तविक समाधान दिखाई न दे। केवल आवेदन प्राप्त कर लेना और समस्या का समाधान कर देना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

दूसरी ओर यह भी हो सकता है कि लोगों के मन में यह धारणा बन गई हो कि जब तक उनकी शिकायत सीधे कलेक्टर या वरिष्ठ अधिकारियों तक नहीं पहुंचेगी, तब तक उस पर गंभीरता से कार्रवाई नहीं होगी। यही कारण है कि समाधान शिविर में आवेदन देने के बाद भी लोग जनदर्शन में दोबारा पहुंचकर अपनी बात रखना जरूरी समझते हैं।

यह स्थिति प्रशासन के लिए आत्ममंथन का विषय है। यदि सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर समाधान शिविरों का आयोजन कर रही है, तो उसके परिणाम भी धरातल पर दिखाई देने चाहिए। जनदर्शन में लगातार उमड़ रही भीड़ कहीं न कहीं इस बात का संकेत देती है कि या तो समस्याओं का पूर्ण समाधान नहीं हो पा रहा है, या फिर जनता का भरोसा अभी भी पारंपरिक शिकायत निवारण व्यवस्था पर अधिक है।

सुशासन का अर्थ केवल कार्यक्रमों का आयोजन नहीं, बल्कि जनता को यह विश्वास दिलाना भी है कि उसकी समस्या का समाधान निश्चित समय सीमा में होगा। यदि समाधान शिविरों के बाद भी लोग बड़ी संख्या में जनदर्शन पहुंच रहे हैं, तो प्रशासन को यह जानने की आवश्यकता है कि आखिर जनता को दोबारा शिकायत दर्ज कराने की जरूरत क्यों पड़ रही है।

सरकार और प्रशासन के लिए यह एक महत्वपूर्ण संकेत है। समाधान शिविरों की सफलता का वास्तविक पैमाना मंचों पर दिए गए भाषण नहीं, बल्कि जनदर्शन में घटती शिकायतों की संख्या होनी चाहिए। जब तक लोग अपनी समस्या के समाधान के लिए बार-बार अधिकारियों के सामने पहुंचने को मजबूर हैं, तब तक यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि सुशासन की अवधारणा पूरी तरह जमीन पर उतर चुकी है।

अब सवाल यह नहीं है कि समाधान शिविर कितने लगाए गए, बल्कि यह है कि उन शिविरों में मिली शिकायतों का समाधान कितना हुआ और जनता का भरोसा कितना बढ़ा। यही किसी भी सुशासन अभियान की असली कसौटी है।

सुफल दास मानिकपुरी, संपादक, बेमेतरा टाइम्स दैनिक अखबार 

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