पुरातत्व विभाग के अनुसार यह मंदिर कवर्धा रियासत के फणि नागवंशी राजाओं द्वारा लगभग 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच निर्मित कराया गया माना जाता है। इसे भोरमदेव मंदिर का समकालीन और फणि नागवंशी कालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण बताया जाता है।
उत्खनन में भगवान गणेश, नंदी, भैरव, महिषासुर मर्दिनी सहित अनेक देवी-देवताओं की खंडित प्रतिमाएं तथा लाल प्रस्तर से निर्मित अलंकृत स्तंभ प्राप्त हुए हैं। मंदिर के गर्भगृह के द्वार पर घट-पल्लव, कीर्तिमुख तथा शैव प्रतिहारों की आकर्षक नक्काशी तत्कालीन शिल्पकला की उत्कृष्टता को दर्शाती है।
वर्तमान में श्रावण मास के दौरान क्षेत्र सहित दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक एवं पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर परिसर में स्थापित शिवलिंग वर्षा ऋतु में जलमग्न हो जाता है, जिससे इसकी प्राकृतिक सुंदरता और बढ़ जाती है।
पर्यटन की अपार संभावनाएं
इतिहासकारों और स्थानीय लोगों का मानना है कि घटियारी शिव मंदिर में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। मंदिर परिसर में कई ध्वस्त मंदिरों के अवशेष, कलात्मक पत्थर के स्तंभ और दुर्लभ मूर्तियां आज भी बिखरी हुई हैं, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण हैं।
हालांकि मंदिर तक पहुंचने वाला मार्ग जर्जर है। यहां पेयजल, शौचालय, विश्रामगृह, सुरक्षा, साफ-सफाई और पर्यटक सुविधाओं का अभाव है। स्थानीय लोगों ने राज्य शासन एवं संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग से मांग की है कि इस ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण कर इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए।
पौराणिक मान्यता भी जुड़ी
स्थानीय जनश्रुति के अनुसार फणि नागवंशी राजा को स्वप्न में भगवान शिव ने इसी स्थान पर मंदिर निर्माण का आदेश दिया था, जिसके बाद इस भव्य शिव मंदिर का निर्माण कराया गया। मान्यता है कि यहां श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
सावन के पावन अवसर पर घटियारी शिव मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की हजारों वर्ष पुरानी कला, स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत का अनमोल प्रतीक बनकर आज भी अपनी गौरवगाथा सुना रहा है।
